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सैनिको का दुख।। एक दुखद: अभिव्यक्ति।। सच्ची प्रार्थना।।

बारामूला के ख्वाजा बाग इलाके में सेना के एक जवान ने एक एटीएम केबिन में प्रवेश किया। वह इसमें से एक सौ रुपये निकालता है, नोट को बड़े करीने से अपने बटुए में रखता है। अगले दिन, वह फिर से लौटता है और एटीएम से उसी राशि को निकालता है। फिर वह आने वाले कई दिनों तक ऐसे ही चलता है।


एटीएम में गार्ड इस कार्य को नोटिस करता है लेकिन वर्दी के बारे में पुराने और गहरे डर को देखते हुए उसी के बारे में पूछताछ करने से परहेज करता है। वह कई दिनों तक ऐसा देखता रहता है । एक दिन जब आसपास कुछ नागरिक होते हैं, वह उससे पूछने की हिम्मत जुटाता है।
जैसा कि उनका मानना ​​है कि अगर जवान उस पर नाराज हो जाता है, तो आसपास के नागरिक उसे बचा लेंगे। गार्ड आगे बढ़ता है: “साहब, आप एटीएम से केवल 100 रुपये ही क्यों निकालते हैं? आप अपने आप को डेली क्यों परेशान करते हैं जब आप एक मोटी राशि निकाल सकते हैं जो हफ्तों तक चलेगी? "

सेना का जवान अपना माथा रगड़ता है है; अपनी पतलून को ठीक से टक करता है और इससे पहले कि वह केबिन से बाहर निकलता है, गार्ड को बताता है जो उत्सुकता से उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है
“मेरे बैंक खाते से जुड़ा मोबाइल नंबर मेरी पत्नी द्वारा घर पर उपयोग किया जाता है। जब मैं एटीएम से नकदी निकालता हूं, तो उसे अपने मोबाइल फोन पर संदेश मिलता है। इस तरह, उसे पता चला कि उसका पति जीवित है ”।
कश्मीर में जीवन की अनिश्चितता ऐसी है


सच्ची प्रार्थना
एक पुजारी थे। लोग उन्हें अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति- भाव से देखते थे। पुजारी प्रतिदिन सुबह मंदिर जाते और दिन भर वहीं यानी मंदिर में रहते। सुबह से ही लोग उनके पास प्रार्थना के लिए आने लगते। जब कुछ लोग इकट्ठे हो जाते , तब मंदिर में सामूहिक प्रार्थना होती। जब प्रार्थना संपन्न हो जाती, तब पुजारी लोगों को अपना उपदेश देते। उसी नगर एक गाड़ीवान था। वह सुबह से शाम तक अपने काम में लगा रहता। इसी से उसकी रोजी -रोटी चलती। यह सोच कर उसके मन में बहुत दुख होता कि मैँ हमेशा अपना पेट पालने के लिए काम धंधे में लगा रहता हूँ, जबकि लोग मंदिर में जाते है और प्रार्थना करते हैं। मुझ जैसा पापी शायद ही कोई इस संसार में हो। मारे आत्मग्लानि के गाड़ीवान ने पुजारी के पास पहुंचकर अपना दुख जताया। 'पुजारी जी! मैं आपसे यह पूछने आया हूँ कि क्या मैं अपना यह काम छोड़ कर नियमित मंदिर मेँ प्रार्थना के लिए आना आरंभ कर दूँ।' पुजारी ने गाड़ीवान की बात गंभीरता से सुनी। उन्होंने गाड़ीवान से पूछा,'अच्छा, तुम यह बताओ कि तुम गाड़ी में सुबह से शाम तक लोगों को एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचाते हो।क्या कभी ऐसे अवसर आए हैं कि तुम अपनी गाड़ी में बूढ़े,अपाहिजों और बच्चों को मुफ्त में एक गांव से दूसरे गांव तक ले गए हो?गाड़ीवान ने तुरंत ही उत्तर दिया,'हां पुजारी जी!ऐसे अनेक अवसर आते हैं। यहां तक कि जब मुझे यह लगता है कि राहगीर पैदल चल पाने में असमर्थ है, तब मैं उसे अपनी गाड़ी में बैठा लेता हूँ।' पुजारी गाड़ीवान की यह बात सुनकर अत्यंत उत्साहित हुए। उन्होंने गाड़ीवान से कहा,'तब तुम अपना पेशा बिल्कुल मत छोड़ो। थके हुए बूढ़ों,अपाहिजों, रोगियों और बच्चों को कष्ट से राहत देना ही ईश्वर की सच्ची प्रार्थना है। सच तो यह है कि सच्ची प्रार्थना तो तुम ही कर रहे हो।'यह सुनकर गाड़ीवान अभिभूत हो उठा।